Riyasat IAS Mentorship Team
Updated 19 Jul 2026
43 min read
आज के विषय (Topics Covered Today) — 5
बायोचार: कृषि अपशिष्ट के ‘धुएँ’ को ‘काले सोने’ में बदलना — GS पेपर 3 (कृषि, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन)
भारत में जंक फूड विज्ञापन: जन स्वास्थ्य बनाम व्यावसायिक लाभ — GS पेपर 2 (स्वास्थ्य, सरकारी नीतियां, विनियमन)
फुटपाथ पर चलने का अधिकार: ‘शरण स्थली’ से ‘संवैधानिक अधिकार’ — GS पेपर 2 (राजव्यवस्था, मौलिक अधिकार, नगरीय शासन)
पुलिस की ‘आगे की जांच’ और अदालती अनुमति (BNSS) — GS पेपर 2 (राजव्यवस्था, आपराधिक न्याय प्रणाली, न्यायपालिका)
FMCG बनाम D2C: भारतीय उपभोक्ता बाज़ार में विलय की नई लहर — GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप, उपभोक्ता बाज़ार)
विषय 1: बायोचार — कृषि अपशिष्ट के ‘धुएँ’ को ‘काले सोने’ में बदलना GS पेपर 3 │ कृषि │ मृदा स्वास्थ्य │ जलवायु परिवर्तन │ कार्बन क्रेडिट │ चक्रीय अर्थव्यवस्था
⚡ चर्चा में क्यों? / संदर्भ भारत की कृषि आज एक अजीब और गंभीर विरोधाभास से जूझ रही है। एक तरफ जहां पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में हर साल कटाई के बाद 2 करोड़ टन से अधिक धान की पराली को खुलेआम जला दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र की काली मिट्टी से लेकर केरल की लाल मिट्टी तक, हमारी कृषि भूमि में जैविक कार्बन की भारी कमी हो रही है। बायोचार — जिसे कृषि का ‘काला सोना’ कहा जाता है — इस दोहरी समस्या का एक वैज्ञानिक समाधान है।
बायोचार क्या है और यह कैसे बनता है?
बायोचार एक प्रकार का चारकोल (कोयला) है, जो कृषि अपशिष्ट (जैसे पराली, मक्का के डंठल, नारियल के छिलके) से बनाया जाता है।
निर्माण प्रक्रिया — पायरोलिसिस (Pyrolysis): जैविक कचरे को कम ऑक्सीजन की उपस्थिति में उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है। इससे जो काला पदार्थ बनता है उसमें कार्बन की प्रचुर मात्रा होती है।
विशेषता: बायोचार मिट्टी में बहुत धीरे-धीरे विघटित होता है, जिससे कार्बन हजारों सालों तक मिट्टी में लॉक (सिक्वेस्टर) रहता है — यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
भारतीय कृषि और पर्यावरण के लिए बायोचार का महत्व
क. मृदा स्वास्थ्य में सुधार
जल धारण क्षमता में वृद्धि: बायोचार की छिद्रयुक्त संरचना मिट्टी की जल धारण क्षमता को 10% से 25% तक बढ़ा देती है — सूखाग्रस्त और वर्षा-आधारित क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण।
लाभकारी सूक्ष्मजीवों के विकास के लिए एक बेहतरीन वातावरण प्रदान करता है।
पोषक तत्वों के क्षरण (Leaching) को रोकता है।
ख. फसल उत्पादकता में वृद्धि
विशेष रूप से पोषक तत्वों की कमी वाली मिट्टी में बायोचार के प्रयोग से फसल उत्पादकता में 10% से 30% तक का सुधार देखा गया है।
महाराष्ट्र (अकोला): मक्के के डंठल से बने बायोचार ने काली मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई।
केरल: नारियल के पत्तों के डंठल से बने बायोचार ने विभिन्न फसल प्रणालियों में मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार किया।
ग. जलवायु अनुकूलन
सूखा, भीषण गर्मी और बेमौसम बारिश जैसी चरम मौसमी घटनाओं के बढ़ते दौर में बायोचार फसलों को नमी की कमी से निपटने में मदद करता है। यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है।
घ. कार्बन क्रेडिट बाज़ार
अंतरराष्ट्रीय मानक: ‘VM0042 कृषि भूमि प्रबंधन पद्धति’ के तहत प्रमाणित बायोचार का प्रत्येक टन 2 से 2.8 टन CO₂ के बराबर कार्बन क्रेडिट उत्पन्न कर सकता है।
भारतीय नवाचार — ‘किसान भट्ठा’: IIT-खड़गपुर का यह कम लागत वाला पायरोलिसिस उपकरण छोटे किसानों को उनके कृषि अपशिष्ट से बायोचार बनाने और कार्बन क्रेडिट के जरिए मुद्रीकरण करने की सुविधा देता है।
वैश्विक अनुभव से सीख
देश/संस्थान
दृष्टिकोण और प्रभाव
केन्या
चावल के छिलकों को बायोचार में बदला; जिससे हजारों कार्बन क्रेडिट मिले और मिट्टी के pH व फास्फोरस स्तर में सुधार हुआ।
थाईलैंड
बायोचार को राष्ट्रीय कार्बन रजिस्ट्री प्रणाली से जोड़ा, जिससे नीति सीधे बाजार से जुड़ गई।
ब्राजील
गन्ने की खोई (Bagasse) से बायोचार बनाया; मिट्टी में उच्च कार्बन प्रतिधारण और पैदावार में भारी वृद्धि दर्ज।
शहरी कचरे का समाधान
बायोचार का दायरा केवल खेतों तक सीमित नहीं है। भारत प्रतिवर्ष लगभग 62 मिलियन टन शहरी ठोस कचरा पैदा करता है, जिसमें से 50% से अधिक जैव-अपघटनीय है। इस शहरी जैविक कचरे और सीवेज के कीचड़ को बायोचार में बदलकर लैंडफिल से उत्सर्जित होने वाली मीथेन को रोका जा सकता है और ‘चक्रीय अर्थव्यवस्था’ को बढ़ावा दिया जा सकता है।
आगे की राह
नीतिगत एकीकरण: बायोचार को प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना और कार्बन खेती जैसी मौजूदा सरकारी योजनाओं के साथ एकीकृत किया जाए।
विकेंद्रीकृत तकनीक: किसानों को किफायती और छोटे स्तर के पायरोलिसिस उपकरण (जैसे किसान भट्ठा) सुलभ कराने होंगे।
इकोसिस्टम का निर्माण: नवाचार, स्टार्टअप्स, बाजार लिंक और निवेश को एकसाथ लाने वाले एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता है।
📌 UPSC नोट UPSC मुख्य परीक्षा लिंकेज: बायोचार GS पेपर 3 (कृषि, मृदा स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, कार्बन बाज़ार) को SDG 2 (शून्य भूख), SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) और SDG 15 (भूमि पर जीवन) से जोड़ता है। ‘किसान भट्ठा’ नवाचार विज्ञान-एवं-प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग या कार्बन अर्थव्यवस्था से जुड़े किसी भी प्रश्न में उद्धृत करने योग्य है।
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (मुख्य परीक्षा)“बायोचार केवल एक कृषि आदान नहीं, बल्कि यह जलवायु कार्रवाई, मृदा पुनर्स्थापना और ग्रामीण आजीविका सुरक्षा का एक साझा केंद्र बिंदु है।” पराली दहन और मृदा कार्बन ह्रास की भारत की दोहरी चुनौती के आलोक में बायोचार की एक परिवर्तनकारी नीतिगत हस्तक्षेप के रूप में क्षमता की परीक्षा कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा – MCQ)बायोचार के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. बायोचार का निर्माण पायरोलिसिस प्रक्रिया द्वारा होता है, जिसमें जैविक अपशिष्ट को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति या न्यूनतम ऑक्सीजन में उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है। 2. बायोचार मिट्टी में बहुत तेजी से अपघटित हो जाता है, जिससे कार्बन कुछ महीनों के भीतर वायुमंडल में वापस चला जाता है। 3. VM0042 कृषि भूमि प्रबंधन पद्धति के तहत प्रत्येक टन बायोचार 2 से 2.8 टन CO₂ के बराबर कार्बन क्रेडिट उत्पन्न कर सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1 और 2 (B) केवल 1 और 3 (C) केवल 2 और 3 (D) 1, 2 और 3 उत्तर: (B) केवल 1 और 3 — कथन 2 गलत है: बायोचार मिट्टी में बहुत धीरे-धीरे विघटित होता है और कार्बन को हजारों वर्षों तक मिट्टी में सुरक्षित रखता है — यही इसकी सबसे विशिष्ट विशेषता और जलवायु लाभ है।
विषय 2: भारत में जंक फूड विज्ञापन — जन स्वास्थ्य बनाम व्यावसायिक लाभ GS पेपर 2 │ स्वास्थ्य नीति │ FSSAI │ गैर-संचारी रोग │ विज्ञापन नियमन
⚡ चर्चा में क्यों? / संदर्भ चमकते विज्ञापनों के पीछे छिपे अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (UPF) के सच को उजागर करते हुए, FSSAI की हालिया रिपोर्ट चेतावनी देती है कि सेहत के नाम पर परोसे जा रहे ये उत्पाद असल में गंभीर बीमारियों का घर हैं। आज भारत इसी ‘खाद्य विरोधाभास’ से जूझ रहा है, जहां हमारी युवा पीढ़ी को पोषण के छद्म जाल में फंसाकर जंक फूड की लत लगाई जा रही है।
भ्रामक मार्केटिंग और ‘हेलो इफेक्ट’
UPF ब्रांड्स की मूल मार्केटिंग रणनीति है ‘चुनिंदा खुलासा’ (Selective Disclosure) — एक सकारात्मक गुण को उभारना और शेष हानिकारक तत्वों को छुपाना।
उदाहरण: यदि कोई चिप्स ‘बेक्ड’ है, तो विज्ञापन केवल उसके क्रंच और कम तेल पर जोर देगा — लेकिन माल्टोडेक्सट्रिन, कृत्रिम फ्लेवर, अम्लता नियामक (627, 631) और अत्यधिक सोडियम की मौजूदगी को छुपा लेगा।
हेलो इफेक्ट: इस रणनीति से उपभोक्ताओं (विशेषकर बच्चों और अभिभावकों) में ‘स्वास्थ्यप्रद’ होने का भ्रम पैदा होता है, और वे इसे स्वास्थ्यकर समझकर रोज खाने लगते हैं।
चिंताजनक विषय
विज्ञापनों का आर्थिक बल: अकेले भारत में एक महीने में 2 लाख से अधिक जंक फूड विज्ञापनों पर लगभग ₹170 करोड़ खर्च किए जाते हैं। वैश्विक स्तर पर 2024 में तीन बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने विज्ञापनों पर 13.2 अरब डॉलर खर्च किए।
द लैंसेट रिपोर्ट (नवंबर 2025): वैज्ञानिक प्रमाणों से स्पष्ट है कि UPF का अधिक सेवन सीधे मोटापा, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और टाइप-2 मधुमेह (NCDs) के जोखिम को बढ़ाता है।
व्यसन विज्ञान: शोध बताते हैं कि अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का डिज़ाइन मस्तिष्क में वही तंत्र सक्रिय करता है जो अल्कोहल जैसी लत के दौरान काम करता है — जिससे इन्हें छोड़ना शारीरिक रूप से कठिन हो जाता है।
भारत में नीतिगत परिदृश्य
एनएमएपी (2017-2022): गैर-संचारी रोगों की रोकथाम के लिए बनी राष्ट्रीय कार्य योजना में HFSS खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों पर प्रतिबंध की परिकल्पना थी, जो अब तक पूरी तरह लागू नहीं हो सकी।
सर्वोच्च न्यायालय (फरवरी 2026): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ‘स्वास्थ्य का अधिकार’ मौलिक अधिकार है और Front-of-Pack Labelling (FOPL) को अनिवार्य बनाया जाए। न्यायालय ने आगाह किया कि भ्रामक विज्ञापन गर्भवती महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26: इस सरकारी दस्तावेज में भी अस्वास्थ्यकर आहार और UPF के बढ़ते चलन पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है।
वैश्विक परिदृश्य: स्व-नियमन बनाम सख्त कानून
देश
रणनीति और प्रभाव
चिली और मैक्सिको
स्वैच्छिक स्व-नियमन को खारिज कर कड़े और लागू करने योग्य कानूनी उपाय अपनाए — सकारात्मक परिणाम मिले।
ब्राजील
स्कूलों और बच्चों के परिवेश को जंक फूड से मुक्त रखने के लिए केवल सलाह नहीं, बल्कि स्पष्ट नीतिगत दिशा-निर्देश लागू किए।
सैन फ्रांसिस्को
शहर ने मोटापे और मधुमेह के जोखिमों को छुपाने और बच्चों को लक्षित करने के आरोप में 10 बड़े UPF निर्माताओं पर मुकदमा दायर किया।
आगे की राह
कड़े विज्ञापन कानूनों में संशोधन: बच्चों के टीवी शो, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर UPF/HFSS विज्ञापनों पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगाया जाए।
वैधानिक Front-of-Pack चेतावनी (FOPL): खाद्य पैकेटों पर ‘उच्च चीनी’ या ‘उच्च सोडियम’ का स्पष्ट और बड़ा ट्रैफिक-लाइट सिग्नल (लाल, पीला, हरा) अनिवार्य किया जाए।
कठोर कराधान (सिन टैक्स): अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों पर उच्च कर लगाया जाए और राजस्व का उपयोग स्थानीय, कम प्रसंस्कृत और पारंपरिक पौष्टिक खाद्यों को बढ़ावा देने में हो।
उद्योग अनुकूल दृष्टिकोण: यह नीति उद्योग-विरोधी नहीं है — यह कंपनियों को विज्ञापन खर्च घटाकर स्वास्थ्य-उन्मुख खाद्य प्रणालियों में निवेश करने का अवसर देती है।
📌 UPSC नोट UPSC मुख्य परीक्षा लिंकेज: यह विषय GS पेपर 2 (स्वास्थ्य नीति, सरकारी विनियमन, सामाजिक न्याय) और GS पेपर 3 (उपभोक्ता बाज़ार, विज्ञापन अर्थशास्त्र) दोनों से जुड़ता है। सुप्रीम कोर्ट का ‘स्वास्थ्य का अधिकार’ निर्णय और FSSAI/FOPL बहस परीक्षा की दृष्टि से उच्च मूल्य के बिंदु हैं।
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (मुख्य परीक्षा)“भारत में बढ़ते गैर-संचारी रोगों (NCDs) के बोझ के पीछे अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (UPF) का आक्रामक विपणन एक प्रमुख कारक बनकर उभरा है। इस आलोक में, जन स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जंक फूड विज्ञापनों के कड़े कानूनी नियमन की आवश्यकता का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।” (250 शब्द, 15 अंक)
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा – MCQ)जंक फूड विज्ञापन के नियमन और अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (UPF) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. सर्वोच्च न्यायालय ने ‘स्वास्थ्य के अधिकार’ को मौलिक अधिकार मानते हुए Front-of-Pack Labelling (FOPL) को अनिवार्य बनाने का निर्देश दिया है। 2. भारत की राष्ट्रीय कार्य योजना (NMAP) ने HFSS खाद्य विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध पूरी तरह लागू कर दिया है। 3. शोध बताते हैं कि अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ मस्तिष्क में वही तंत्र सक्रिय करते हैं जो नशीले पदार्थों की लत में काम करता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1 और 3 (B) केवल 2 और 3 (C) केवल 1 (D) 1, 2 और 3 उत्तर: (A) केवल 1 और 3 — कथन 2 गलत है: भारत की NMAP ने HFSS खाद्य विज्ञापनों पर प्रतिबंध की परिकल्पना की थी, लेकिन यह अब तक पूरी तरह लागू नहीं हो सका है। कथन 1 और 3 सही हैं।
विषय 3: फुटपाथ पर चलने का अधिकार — ‘शरण स्थली’ से ‘संवैधानिक अधिकार’ GS पेपर 2 │ अनुच्छेद 21 │ अनुच्छेद 39(ख) │ न्यायिक सक्रियता │ नगरीय शासन │ पैदल यात्री अधिकार
⚡ चर्चा में क्यों? / संदर्भ हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला (मनियार इलियाज़ बनाम पी. अय्यप्पन) सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि फुटपाथ केवल जमीन का एक संकरा टुकड़ा नहीं है जहां ‘कम भाग्यशाली’ लोग तेज रफ्तार गाड़ियों से बचने के लिए शरण लेते हैं — बल्कि यह नागरिक सभ्यता और समानता का प्रतीक है। सुरक्षित फुटपाथ पर चलना ‘मोटर वाहनों द्वारा आवागमन पर प्राथमिकता’ रखता है।
फैसले के मुख्य बिंदु
1. ‘चलने का आनंद’ एक बुनियादी अधिकार
अदालत ने फुटपाथ को केवल ‘दुर्घटना निवारण क्षेत्र’ के संकीर्ण दायरे से बाहर निकाला।
चौड़े और सुरक्षित पैदल मार्ग इस बात का प्रमाण हैं कि समाज अपनी जनता की स्वतंत्रता और गरिमा का कितना सम्मान करता है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों पर पैदल यात्रियों की पहुंच मोटर वाहनों के आवागमन पर प्राथमिकता रखती है।
2. शहरी नियोजन में ‘साझा संसाधनों की त्रासदी’
पर्यावरण कानून की ‘Tragedy of the Commons’ की अवधारणा का प्रयोग करते हुए न्यायालय ने बताया कि भारत के शहरों के फुटपाथ इसी त्रासदी से गुजर रहे हैं:
वाहन पार्किंग द्वारा अतिक्रमण (जिसमें संस्थागत मामले जैसे बेंगलुरु में पुलिस वाहनों की कतारें शामिल हैं)
अवैध व्यावसायिक वेंडिंग और कचरा डंपिंग — जिससे फुटपाथ एक ‘दुर्लभ संसाधन’ बन गए हैं
3. संवैधानिक आधार — अनुच्छेद 21 और 39(ख)
अनुच्छेद 21 (जीवन जीने का अधिकार): सार्वजनिक अवसंरचना पर सुरक्षित रूप से चलना, गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का विस्तार है।
अनुच्छेद 39(ख) (DPSP): इसके अनुसार समुदाय के भौतिक संसाधनों का वितरण जनहित की सर्वोत्तम पूर्ति के लिए होना चाहिए। सड़कें और फुटपाथ भी ऐसे भौतिक संसाधन हैं — इनके डिज़ाइन और आवंटन में पैदल यात्रियों के हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, विशेषकर उन लोगों को जो निजी वाहन नहीं खरीद सकते।
कानूनी कमियां
मोटर वाहन अधिनियम, 1988: यह कानून वाहनों के सुचारू आवागमन को प्राथमिकता देता रहा, जिससे अनजाने में पैदल यात्रियों के अधिकारों का हनन होता रहा।
जवाबदेही का अभाव: फुटपाथों के प्रबंधन की जिम्मेदारी नगर निगमों और नगरपालिकाओं की है, लेकिन इस सार्वजनिक हित की ‘धरोहर’ की भारी उपेक्षा की गई है।
न्यायालय का संस्थागत ढांचा — घोषणा से आगे
समर्पित कानून: संसद और राज्य विधानसभाओं को फुटपाथ संरक्षण के लिए एक समर्पित अधिनियम बनाना चाहिए — जैसे शिक्षा का अधिकार अधिनियम एक मौलिक अधिकार के क्रियान्वयन का तंत्र है।
स्वतंत्र नियामक: जैसे NCPCR अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) को लागू करता है, वैसे ही पैदल यात्रियों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र नियामक संस्था होनी चाहिए।
विधि आयोग को निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय विधि आयोग और केंद्रीय मंत्रालयों को इस निर्णय की प्रति भेजी है।
📌 UPSC नोट UPSC मुख्य परीक्षा लिंकेज: यह निर्णय GS पेपर 2 (मौलिक अधिकार — अनुच्छेद 21, DPSP — अनुच्छेद 39(ख), न्यायिक सक्रियता, नगरीय शासन) को GS पेपर 1 (नगरीकरण की चुनौतियां) और GS पेपर 3 (SDG 11: सतत शहर और समुदाय) से जोड़ता है। ‘साझा संसाधनों की त्रासदी’ की अवधारणा और शिक्षा अधिकार अधिनियम की सादृश्यता उच्च मूल्य के विश्लेषणात्मक कोण हैं।
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (मुख्य परीक्षा)“सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फुटपाथ पर सुरक्षित चलने के अधिकार को जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) के हिस्से के रूप में मान्यता देना, मानव-केंद्रित नगरीय शासन की ओर व्यापक न्यायिक बदलाव को दर्शाता है।” इस कथन की भारत की नगरीकरण चुनौतियों और पैदल यात्री अधिकारों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में परीक्षा कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा – MCQ)फुटपाथ पर पैदल यात्री अधिकारों पर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. न्यायालय ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर पैदल यात्रियों की फुटपाथ तक पहुंच, मोटर वाहन यातायात पर प्राथमिकता रखती है। 2. न्यायालय ने अनुच्छेद 39(ख) का प्रयोग करते हुए कहा कि सड़कें और फुटपाथ समुदाय के भौतिक संसाधन हैं, जिनका वितरण जनहित में होना चाहिए। 3. न्यायालय ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम की तर्ज पर फुटपाथ संरक्षण के लिए समर्पित कानून बनाने की सिफारिश की। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1 और 2 (B) केवल 2 और 3 (C) केवल 1 और 3 (D) 1, 2 और 3 उत्तर: (D) 1, 2 और 3 — तीनों कथन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की मुख्य बातों को सटीक रूप से प्रतिबिंबित करते हैं: पैदल यात्री प्राथमिकता, अनुच्छेद 39(ख) का प्रयोग, और शिक्षा अधिकार अधिनियम के समान समर्पित कानून की सिफारिश।
विषय 4: पुलिस की ‘आगे की जांच’ और अदालती अनुमति — BNSS बनाम CrPC GS पेपर 2 │ आपराधिक न्याय प्रणाली │ BNSS 2023 │ न्यायिक निगरानी │ राजव्यवस्था
⚡ चर्चा में क्यों? / संदर्भ हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पालिनीस्वामी वीरराजा बनाम कर्नाटक राज्य मामले में दिए गए निर्णय और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 के लागू होने के साथ, पुलिस जांच अधिकारों की वैधानिक सीमाओं — विशेषकर चार्जशीट दाखिल होने के बाद ‘आगे की जांच’ पर — को समझना आवश्यक है।
मुख्य कानूनी प्रावधान: CrPC बनाम BNSS
पहलू
CrPC (पुराना कानून)
BNSS 2023 (नया कानून)
संबंधित प्रावधान
धारा 173(8)
धारा 193(9)
आगे की जांच के लिए अनुमति
मूल पाठ में स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं था; न्यायिक व्याख्या के माध्यम से विकसित हुआ
यदि मुकदमा (Trial) शुरू हो चुका है, तो न्यायालय की पूर्व अनुमति स्पष्ट रूप से अनिवार्य की गई है
मुख्य परिवर्तन
अनुमति की आवश्यकता सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के माध्यम से समय के साथ विकसित हुई
अब एक वैधानिक आवश्यकता के रूप में संहिताबद्ध — केवल न्यायिक सिद्धांत नहीं
सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय
विनय त्यागी बनाम इरशाद अली (2013): न्यायालय ने ‘समकालीन व्याख्या का सिद्धांत’ (Contemporanea Expositio) लागू किया — भले ही CrPC की धारा 173(8) के मूल पाठ में ‘अनुमति’ शब्द स्पष्ट न हो, लेकिन स्थापित प्रथा और कानून के अंतर्निहित अर्थ के अनुसार आगे की जांच के लिए मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति अनिवार्य है।
रामा चौधरी बनाम बिहार राज्य (2024) और रॉबर्ट लालचुंगनुंगा चोंगथु बनाम बिहार राज्य (2025): न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि चार्जशीट या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने के बाद नए सबूतों के आधार पर आगे की जांच केवल अदालत की अनुमति से ही की जा सकती है।
हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (1992): इस ऐतिहासिक मामले के अनुसार, यदि कोई विवाद विशुद्ध रूप से दीवानी प्रकृति (Civil Nature) का है, तो उसके आधार पर FIR और आपराधिक कार्यवाही को उच्च न्यायालय रद्द कर सकता है।
त्वरित स्पष्टीकरण
प्रश्न
उत्तर
क्या पुलिस चार्जशीट दाखिल करने के बाद कभी भी स्वतः आगे की जांच शुरू कर सकती है?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम निर्णयों और BNSS के संहिताकरण के अनुसार, चार्जशीट/क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने के बाद या मुकदमा शुरू होने के बाद न्यायालय की अनुमति अनिवार्य है।
क्या विशुद्ध दीवानी प्रकृति के विवाद पर भी पुलिस आपराधिक मामला चला सकती है?
नहीं। भजन लाल केस (1992) के अनुसार, विशुद्ध दीवानी प्रकृति के विवाद पर आधारित आपराधिक कार्यवाही को उच्च न्यायालय रद्द कर सकता है।
📌 UPSC नोट UPSC मुख्य परीक्षा लिंकेज: यह विषय GS पेपर 2 (आपराधिक न्याय सुधार, BNSS बनाम CrPC, पुलिस और न्यायिक शक्तियों का पृथक्करण, विधि का शासन) के अंतर्गत आता है। BNSS 2023 हाल के विधायी सुधार के कारण UPSC के लिए उच्च प्राथमिकता क्षेत्र है।
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (मुख्य परीक्षा)भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 ने चार्जशीट दाखिल होने के बाद पुलिस जांच की निगरानी शक्तियों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं, विशेषकर ‘आगे की जांच’ के संदर्भ में। इन बदलावों की विवेचना कीजिए और जांच की कार्यकुशलता एवं न्यायिक निगरानी के बीच संतुलन के लिए इनके निहितार्थों का आकलन कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा – MCQ)आपराधिक प्रक्रिया के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 193(9) के तहत, यदि मुकदमा शुरू हो चुका है, तो पुलिस को आगे की जांच के लिए अदालत की अनुमति लेना अनिवार्य है। 2. सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, भले ही पूर्ववर्ती कानून (CrPC) के मूल पाठ में स्पष्ट उल्लेख न हो, लेकिन जांच पूरी होने के बाद पूरक रिपोर्ट दाखिल करने के लिए मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति लेना कानून का एक अभिन्न अंग बन चुका है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (a) केवल 1 (b) केवल 2 (c) 1 और 2 दोनों (d) न तो 1 और न ही 2 उत्तर: (c) 1 और 2 दोनों — कथन 1 सही है: BNSS की धारा 193(9) मुकदमा शुरू होने के बाद आगे की जांच के लिए न्यायालय की अनुमति अनिवार्य करती है। कथन 2 भी सही है: विनय त्यागी बनाम इरशाद अली (2013) में सुप्रीम कोर्ट ने Contemporanea Expositio सिद्धांत के माध्यम से यह स्पष्ट किया।
विषय 5: FMCG बनाम D2C — भारतीय उपभोक्ता बाज़ार में विलय की नई लहर GS पेपर 3 │ भारतीय अर्थव्यवस्था │ स्टार्टअप इकोसिस्टम │ उपभोक्ता बाज़ार │ डिजिटल पैठ
⚡ चर्चा में क्यों? / संदर्भ भारतीय कॉर्पोरेट जगत में स्थापित FMCG दिग्गजों द्वारा इंटरनेट-आधारित छोटे Direct-to-Consumer (D2C) ब्रांड्स का हालिया अधिग्रहण महज एक व्यावसायिक सौदा नहीं है। यह बदलती उपभोक्ता प्राथमिकताओं, डिजिटल पैठ, त्वरित वाणिज्य के उभार और बदलते निवेश माहौल का प्रतिबिंब है — जो भारत के खुदरा क्षेत्र के ‘ओमनीचैनल भविष्य’ की ओर रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है।
FMCG कंपनियां D2C ब्रांड्स क्यों खरीद रही हैं?
1. ‘निर्माण बनाम खरीद’ का सिद्धांत
पारंपरिक FMCG ढांचा बड़े पैमाने पर उत्पादन और दक्षता के लिए बना है — नए और अनूठे प्रयोग (जैसे क्लीन-लेबल न्यूट्रिशन, एक्टिव ब्यूटी, ऑर्गेनिक फूड्स) उस गति से नहीं हो सकते जो एक स्टार्टअप कर लेता है। आंतरिक R&D में सालों लगाने से बेहतर यह है कि एक स्थापित, युवा वर्ग में लोकप्रिय ब्रांड को सीधे खरीद लिया जाए।
2. डिजिटल पैठ और त्वरित वाणिज्य का उभार
भारत में पारंपरिक किराना दुकानों पर ऑनलाइन पहुंच अभी भी 5% से कम है, लेकिन ‘क्विक कॉमर्स’ के आने से उपभोक्ता व्यवहार बदल गया है — अब महंगे कॉस्मेटिक्स और पर्सनल केयर उत्पाद भी 10 मिनट में मंगाए जाते हैं। D2C ब्रांड्स के पास इस डिजिटल उपभोक्ता व्यवहार का सटीक डेटा और अनुभव है, जिसे FMCG कंपनियां हासिल करना चाहती हैं।
3. ‘सस्ते वित्त’ के दौर का अंत
जब तक वैश्विक ब्याज दरें कम थीं, वेंचर कैपिटलिस्ट D2C स्टार्टअप्स में दिल खोलकर निवेश करते थे। अब उच्च ब्याज दरों और निवेशकों के ध्यान के डीप-टेक व AI की तरफ शिफ्ट होने से पूंजी दुर्लभ हो गई है। इन स्टार्टअप्स के लिए बड़ी FMCG कंपनियों के साथ विलय एक सुरक्षित और लाभदायक एग्जिट रूट बन गया है।
रणनीतिक तालमेल: प्रत्येक पक्ष क्या लाता है
D2C ब्रांड्स की ताकत
FMCG दिग्गजों की ताकत
युवा, वफादार और डिजिटल रूप से सक्रिय उपभोक्ता आधार
विशाल विनिर्माण क्षमता और पैमाने की अर्थव्यवस्था
सोशल मीडिया, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल मार्केटिंग में विशेषज्ञता
गहरा ऑफलाइन वितरण नेटवर्क — किराना दुकानें, ग्रामीण खुदरा, फार्मेसी
बाज़ार ट्रेंड्स को समझकर तेजी से नए उत्पाद लॉन्च करने की फुर्ती
लंबी अवधि तक निवेश करने और घाटा सहने की आर्थिक ताकत
ओमनीचैनल डिजिटल-फर्स्ट ब्रांड इक्विटी
दशकों पुराने संस्थागत आपूर्ति श्रृंखला संबंध
परिणाम: एक ऐसा संयुक्त मॉडल जिसकी ऑनलाइन (वेबसाइट, ऐप, Q-Commerce) और ऑफलाइन (किराना, आधुनिक ट्रेड, ग्रामीण जनरल ट्रेड) दोनों जगहों पर समान रूप से मजबूत उपस्थिति हो।
वितरण की सीमा और ‘ओमनीचैनल’ का अनिवार्य रास्ता
D2C ब्रांड्स ऑनलाइन तो तेजी से बढ़ते हैं, लेकिन एक निश्चित स्तर (जैसे ₹100 करोड़ का टर्नओवर) के बाद Meta और Google पर विज्ञापन के जरिए ग्राहक हासिल करने की लागत (Customer Acquisition Cost) बहुत बढ़ जाती है। स्थायी और बड़ा ब्रांड बनने के लिए भारत के असली बाज़ार — जनरल ट्रेड (किराना दुकानें), फार्मेसियों और ग्रामीण खुदरा नेटवर्क — में प्रवेश करना ज़रूरी है। यहीं FMCG कंपनियों का दशकों पुराना आपूर्ति श्रृंखला नेटवर्क इन स्टार्टअप्स के लिए ‘संजीवनी बूस्ट’ का काम करता है।
मुख्य शब्दावली
शब्द
परिभाषा
FMCG (Fast-Moving Consumer Goods)
वे उत्पाद जो तेजी से बिकते हैं और कम लागत के होते हैं (साबुन, बिस्कुट, टूथपेस्ट) — इनका पारंपरिक ऑफलाइन वितरण नेटवर्क बहुत मजबूत होता है
D2C (Direct-to-Consumer)
ऐसे ब्रांड जो बिचौलियों को छोड़कर अपनी वेबसाइट या सोशल मीडिया के जरिए सीधे उपभोक्ताओं को सामान बेचते हैं — ये मूलतः ‘डिजिटल-फर्स्ट’ होते हैं
त्वरित वाणिज्य (Quick Commerce)
10-15 मिनट में डिलीवरी करने वाले प्लेटफॉर्म — जैसे ब्लिंकइट (Blinkit), इंस्टामार्ट (Instamart) और ज़ेप्टो (Zepto)
ग्राहक अधिग्रहण लागत (CAC)
एक नए भुगतान करने वाले ग्राहक को प्राप्त करने में लगने वाली कुल मार्केटिंग लागत — D2C ब्रांड्स की व्यवहार्यता का एक महत्वपूर्ण मापदंड
📌 UPSC नोट UPSC मुख्य परीक्षा लिंकेज: यह विषय GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था, औद्योगिक नीति, स्टार्टअप इकोसिस्टम, उपभोक्ता बाज़ार, डिजिटल अवसंरचना) में फिट बैठता है। FMCG बनाम D2C गतिशीलता, त्वरित वाणिज्य और ‘ओमनीचैनल रिटेल’ — अर्थव्यवस्था-रणनीति या औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र प्रश्नों में उभरने की संभावना है।
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (मुख्य परीक्षा)“D2C स्टार्टअप्स का FMCG समूहों द्वारा अधिग्रहण भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम की परिपक्वता और विशुद्ध डिजिटल विकास मॉडलों की संरचनात्मक सीमाओं दोनों को दर्शाता है।” भारत के उपभोक्ता वस्तु बाज़ार की बदलती गतिशीलता के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा – MCQ)भारत में Direct-to-Consumer (D2C) ब्रांड्स और FMCG कंपनियों द्वारा उनके अधिग्रहण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. D2C ब्रांड्स की प्रतिस्पर्धात्मक श्रेष्ठता पारंपरिक किराना दुकान वितरण नेटवर्क पर निर्भरता से आती है, जो FMCG कंपनियों की तुलना में उनका मुख्य लाभ है। 2. त्वरित वाणिज्य (Quick Commerce) प्लेटफॉर्म के उभार ने डिलीवरी गति के बारे में उपभोक्ता अपेक्षाओं को बदल दिया है, जिस क्षेत्र में D2C ब्रांड्स ने मजबूत डेटा और परिचालन विशेषज्ञता विकसित की है। 3. वैश्विक स्तर पर उच्च ब्याज दरों के दौर के अंत ने D2C स्टार्टअप्स पर वित्तीय दबाव बढ़ाया है, जिससे FMCG कंपनियों के साथ विलय एक वित्तीय रूप से आकर्षक एग्जिट विकल्प बन गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1 और 2 (B) केवल 2 और 3 (C) केवल 1 और 3 (D) 1, 2 और 3 उत्तर: (B) केवल 2 और 3 — कथन 1 गलत है: D2C ब्रांड्स की प्रतिस्पर्धात्मक श्रेष्ठता उनकी डिजिटल-फर्स्ट, सीधे उपभोक्ता तक पहुंच — वेबसाइट और सोशल मीडिया के माध्यम से — में है। गहरे ऑफलाइन वितरण तक पहुंच वह चीज है जो D2C ब्रांड्स के पास नहीं होती और जिसके लिए FMCG भागीदारी महत्वपूर्ण बनती है।
रियासत IAS मेंटरशिप — UPSC CSE के लिए स्मार्ट तैयारी करें रियासत अली सर से सीधा मार्गदर्शन │ हिंदी और अंग्रेजी माध्यम │ 100% ऑनलाइन → Apply at iasmentorship.com/admissions