सस्ती हरित ऊर्जा उत्पादन बनाम सही समय पर सही जगह पहुँचाना — GS पेपर 3 (ऊर्जा सुरक्षा, अवसंरचना)
सुरक्षित सीमाएं बनाम मानवीय गरिमा (यूरोपीय संघ का ‘वापसी विनियमन’) — GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध, मानवाधिकार)
विषय 1: फुटपाथ पर चलना एक मौलिक अधिकार GS पेपर 2 │ अनुच्छेद 21 │ जीवन के अधिकार की विस्तारित व्याख्या │ न्यायिक सक्रियता │ नगरीय शासन
⚡ चर्चा में क्यों? हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सड़कों को तो चौड़ा कर दिया गया, लेकिन उन इंसानों के लिए जगह नहीं छोड़ी गई जो गाड़ी नहीं खरीद सकते। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पैदल चलना सिर्फ एक शारीरिक गतिविधि नहीं, बल्कि सम्मान से जीने के अधिकार का हिस्सा है। सार्वजनिक स्थान मोटर वाहनों का एकाधिकार नहीं हैं।
कानूनी और संवैधानिक आधार
अनुच्छेद 21 (जीवन जीने का अधिकार): 1970 के दशक से सुप्रीम कोर्ट जीवन के अधिकार का विस्तार कर रहा है। बिना किसी डर या जीवन के खतरे के फुटपाथ पर सुरक्षित चलना इसी अधिकार का हिस्सा माना गया है।
अनुच्छेद 19(1)(d) (घूमने की स्वतंत्रता): भारत के पूरे भूभाग में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार तभी साकार है जब नागरिक सुरक्षित चल सकें।
लोकतांत्रिक अधिकार: न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा के अनुसार, पैदल चलना अभिव्यक्ति (19(1)(a)), सामूहिक रूप से जुटने (19(1)(b)) और संगठन बनाने (19(1)(c)) के अधिकारों को भी ताकत देता है। इतिहास गवाह है कि स्वतंत्रता संग्राम के कई बड़े आंदोलन (जैसे दांडी मार्च) पैदल चलकर ही शुरू हुए थे।
पृष्ठभूमि: कर्नाटक की दुखद घटना
यह फैसला एक बेहद दुखद घटना से उपजा है। कर्नाटक में एक 5 वर्षीय बच्चा अपने पिता के साथ स्कूल जा रहा था, तभी एक टैंकर लॉरी (ट्रक) ने उसे कुचल दिया।
न्यायालय का कदम: अदालत ने माता-पिता को 11 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया।
सवाल: लेकिन क्या सिर्फ मुआवजा ही समाधान है? कोर्ट ने कहा कि राज्य का यह बुनियादी कर्तव्य है कि वह नागरिकों को सुरक्षित फुटपाथ दे ताकि ऐसी त्रासदियां हो ही न।
मुख्य चुनौतियां
1. संस्थागत और बुनियादी ढांचे की कमी
भारत के अधिकांश शहरों में या तो निरंतर (unbroken) फुटपाथ हैं ही नहीं, या फिर जहां हैं वहां गाड़ियों की पार्किंग, रेहड़ी-पटरी वाले, कचरा या निर्माण सामग्री का कब्जा है।
पैदल यात्रियों की सुरक्षा वर्तमान में किसी एक कानून के तहत नहीं है; यह नगर पालिकाओं, शहरी नियोजन और सड़क डिजाइन के दिशानिर्देशों के बीच बंटी हुई है।
2. ‘अभिजात्यवाद’ का प्रभाव
सड़कों और एक्सप्रेसवे का निर्माण इस तरह किया गया जैसे वे केवल कारों और पहियों वाली मशीनों के लिए हों। पैदल चलने वालों को ‘बाधा’ मानकर दरकिनार कर दिया गया, जबकि देश की एक बहुत बड़ी आबादी (विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) आज भी पैदल चलती है।
3. अन्य कानूनों के साथ टकराव
स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट, 2014: यह कानून रेहड़ी-पटरी वालों को आजीविका का अधिकार देता है। यदि फुटपाथों को पूरी तरह ‘साफ’ किया गया, तो शहरी गरीबों का जीवन और रोज़गार खतरे में पड़ सकता है।
अधिकार-आधारित कानूनों की विफलता: भारत में केवल कानून बना देने से संस्कृति नहीं बदलती (जैसे एंटी-कचरा कानूनों के बावजूद गंदगी की आदत बनी हुई है)।
आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट ने केवल आलोचना नहीं की, बल्कि सरकारों को एक रोडमैप भी दिया है:
एक पूर्णकालिक नियामक निकाय की स्थापना
सड़क निर्माण के साथ ‘सुव्यवस्थित फुटपाथ’ बनाना अनिवार्य
‘मोटर वाहन अधिनियम, 1988’ में संशोधन कर कानूनी ढांचा तैयार करना
मंत्रालयों को निर्देश: कोर्ट ने इस निर्णय की प्रति आवास एवं शहरी मामलों, ग्रामीण विकास, और सड़क परिवहन मंत्रालयों को भेजी है ताकि एक वैधानिक ढांचा तैयार किया जा सके।
संस्थागत विशेषज्ञता: एक ऐसा नियामक होना चाहिए जो उल्लंघन के मामलों में त्वरित समाधान दे और पैदल चलने के अधिकारों की योजना बनाए।
UPSC नोट UPSC मुख्य परीक्षा लिंकेज: यह विषय GS पेपर 2 (अनुच्छेद 21 एवं 19 के तहत मौलिक अधिकार, न्यायिक सक्रियता, नगरीय शासन) को GS पेपर 3 (नगरीय अवसंरचना नियोजन) से जोड़ता है। पैदल यात्री अधिकारों और स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट, 2014 के बीच टकराव — अधिकारों के संघर्ष पर किसी भी उत्तर के लिए एक महत्वपूर्ण परत है।
परीक्षोपयोगी प्रश्न (मुख्य परीक्षा)“हाल ही में न्यायपालिका द्वारा ‘फुटपाथ पर सुरक्षित चलने के अधिकार’ को मान्यता देना, भारत में ‘अधिकार-आधारित नीति निर्माण’ की सीमाओं को रेखांकित करता है। क्या आपको लगता है कि पर्याप्त बजटीय आवंटन और ढांचागत सुधारों के बिना ऐसे न्यायिक निर्देश केवल ‘मुआवजा तंत्र’ बनकर रह जाते हैं? शहरी गरीबों की आजीविका के अधिकार के संदर्भ में इसका आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।” (250 शब्द, 15 अंक)
परीक्षोपयोगी प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा – MCQ)फुटपाथ पर सुरक्षित चलने के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत फुटपाथ पर सुरक्षित चलने के अधिकार को ‘जीवन जीने के अधिकार’ का हिस्सा माना। 2. न्यायालय ने ‘मोटर वाहन अधिनियम, 1988’ में संशोधन का निर्देश दिया। 3. स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट, 2014 का फुटपाथों के कार्यान्वयन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1 और 2 (B) केवल 2 और 3 (C) केवल 1 और 3 (D) 1, 2 और 3 उत्तर: (A) केवल 1 और 2 — कथन 3 गलत है: स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट, 2014 रेहड़ी-पटरी वालों को आजीविका का अधिकार देता है, जो फुटपाथों को ‘साफ’ करने के प्रयासों के साथ सीधे टकरावट में आता है।
⚡ चर्चा में क्यों? हाल ही में एक भू-स्थानिक इंटेलिजेंस फर्म (सुहोरा टेक्नोलॉजीज) ने उपग्रहों (ICEYE, PlanetScope, और LISS-IV) के डेटा के अनुसार अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले के मागो चू बेसिन की 5 में से 4 झीलों का क्षेत्रफल बढ़ा है। सन्हापो झील (Sanhapo Lake): इसमें सबसे ज्यादा विस्तार देखा गया है — 2019 में 78.07 हेक्टेयर से बढ़कर जून 2026 तक 88.81 हेक्टेयर। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने इसे ‘उच्च जोखिम’ श्रेणी में रखा है।
GLOF (हिमनद झील विस्फोट बाढ़) क्या है?
GLOF एक क्रमिक प्रक्रिया से होती है:
चरण 1 (शुरुआत): वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण उच्च ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियरों (हिमनदों) का तेजी से पिघलना शुरू होता है।
चरण 2 (प्राकृतिक संचय): पिघला हुआ पानी ग्लेशियरों द्वारा छोड़े गए पत्थरों, मिट्टी और मलबे (Moraine / मोरेन) के पीछे प्राकृतिक रूप से जमा होने लगता है।
चरण 3 (झील का निर्माण): पानी का संचय बढ़ने से वहां एक अस्थायी हिमनद झील के आकार में निरंतर वृद्धि होती है।
चरण 4 (दबाव में वृद्धि): झील में पानी की मात्रा जैसे-जैसे अपनी चरम सीमा पर पहुंचती है, मलबे से बने कमजोर प्राकृतिक बांध पर जल का दबाव अत्यधिक बढ़ जाता है।
चरण 5 (ट्रिगर पॉइंट): इसी दौरान अचानक होने वाले भूस्खलन या हिमस्खलन के कारण भारी मात्रा में बर्फ या चट्टानें झील में गिरती हैं।
चरण 6 (विस्फोट): इस अचानक झटके से प्राकृतिक बांध टूट जाता है और संचित पानी अत्यधिक गति से बाहर निकल जाता है।
चरण 7 (परिणाम): इसके फलस्वरूप निचले इलाकों में भयानक और विनाशकारी बाढ़ (GLOF) आ जाती है, जो पूरे बुनियादी ढांचे को तबाह कर देती है।
हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) के प्रमुख उदाहरण
क्षेत्र / देश
घटना (वर्ष)
प्रभावित नदी / क्षेत्र
मुख्य कारण और प्रभाव
सिक्किम, भारत
दक्षिण ल्होनक झील (अक्टूबर, 2023)
तीस्ता नदी
बादल फटने/हिमस्खलन के कारण प्राकृतिक मोरेन बांध टूटा। प्रभाव: चुंगथांग जलविद्युत बांध पूरी तरह नष्ट, भारी जान-माल का नुकसान।
उत्तराखंड, भारत
चोराबारी ताल / केदारनाथ (जून, 2013)
मंदाकिनी नदी
अत्यधिक बारिश और ग्लेशियर पिघलने से चोराबारी हिमनद झील का बांध फटा। प्रभाव: केदारनाथ घाटी में अभूतपूर्व तबाही और हजारों मौतें।
उत्तराखंड, भारत
चमोली आपदा (फरवरी, 2021)
ऋषिगंगा और धौलीगंगा
नंदा देवी ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटने से अचानक बाढ़ आई। प्रभाव: तपोवन जैसी दो बड़ी हाइड्रोपावर परियोजनाएं पूरी तरह तबाह।
नेपाल
दिग त्सो (Dig Tsho) (अगस्त, 1985)
लेंगमाच ग्लेशियर क्षेत्र
विशाल हिमस्खलन के कारण झील का मोरेन बांध टूटा। महत्व: हिमालयी क्षेत्र में GLOF खतरों को समझने के लिए वैश्विक ‘क्लासिक केस स्टडी’।
पेरू (दक्षिण अमेरिका)
पाल्काकोचा झील (दिसंबर, 1941)
हुआराज़ (Huaraz) शहर
वैश्विक इतिहास की सबसे घातक घटना। झील में विशाल हिमखंड गिरने से बांध टूटा। प्रभाव: हुआराज़ शहर पूरी तरह मलबे में दबा, लगभग 5,000 मौतें।
फ्रांस (यूरोप)
लेक पेलफ्रिमन (1892)
टेटे रूस (Tête Rousse) ग्लेशियर
ग्लेशियर के भीतर छिपी एक ‘सब-ग्लेशियल’ पानी की जेब अचानक फट गई। प्रभाव: सेंट-गेरवाइस रिसॉर्ट शहर तबाह, 175+ मौतें।
जोखिम बनाम आसन्न आपदा
क्षेत्रफल बढ़ना ही एकमात्र खतरा नहीं: केवल झील का आकार बड़ा होना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह कल ही फट जाएगी।
अन्य कारक भी महत्वपूर्ण: खतरा इस बात पर भी निर्भर करता है कि झील के चारों ओर का मलबा (Moraine) कितना मजबूत है, वहां भूकंप आने की कितनी संभावना है, या आसपास भूस्खलन का कितना खतरा है।
अस्थिरता का संकेत: हां, यदि झीलें फैल रही हैं, तो उन्हें ‘अस्थिर’ जरूर माना जाता है और उन पर कड़ी नजर रखने की जरूरत है।
चुनौतियां
जमीनी स्तर पर पहुंच की कमी: ये झीलें हिमालय के अत्यंत दुर्गम और सुदूर इलाकों में स्थित हैं, जहां वैज्ञानिकों का शारीरिक रूप से पहुंचना बेहद कठिन है। इसलिए हमें पूरी तरह उपग्रह निगरानी पर निर्भर रहना पड़ता है।
विज्ञान को नीतियों में बदलना: भारत के पास अब उपग्रहों के माध्यम से इन खतरनाक झीलों की पहचान करने और उनकी मैपिंग करने की बेहतरीन क्षमता है। लेकिन चुनौती यह है कि इस वैज्ञानिक डेटा को व्यावहारिक आपदा प्रबंधन और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों में कैसे बदला जाए।
एकीकृत वैधानिक ढांचे की कमी: वर्तमान में, पैदल यात्रियों या स्थानीय आबादी की सुरक्षा और ऐसे पर्वतीय क्षेत्रों के बुनियादी ढांचे को विनियमित करने वाले नियम अलग-अलग मंत्रालयों (जैसे नगर नियोजन, राष्ट्रीय राजमार्ग, NDMA) में बंटे हुए हैं, जिससे त्वरित निर्णय लेने में बाधा आती है।
UPSC नोट UPSC मुख्य परीक्षा लिंकेज: यह विषय GS पेपर 1 (हिमालयी भूगोल, भू-आकृतिक प्रक्रियाएं) को GS पेपर 3 (आपदा प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन, अवसंरचना नियोजन) से जोड़ता है। सिक्किम (2023) और चमोली (2021) की केस स्टडीज किसी भी आपदा प्रबंधन उत्तर में उद्धृत करने योग्य हैं।
परीक्षोपयोगी प्रश्न (मुख्य परीक्षा)हिमालयी क्षेत्र में हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) एक गंभीर और अपर्याप्त रूप से तैयार आपदा जोखिम है। GLOF की वैज्ञानिक प्रक्रिया की विवेचना कीजिए और उपग्रह-आधारित निगरानी को प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणालियों में बदलने हेतु भारत की संस्थागत तैयारी का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
परीक्षोपयोगी प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा – MCQ)हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. GLOF तब होती है जब हिमनदीय मलबे (Moraine) से बना प्राकृतिक बांध अचानक टूट जाता है और संचित झील का पानी नीचे की ओर बह निकलता है। 2. हिमनद झील के सतही क्षेत्रफल में विस्तार अकेले इस बात की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त है कि GLOF की घटना तत्काल होने वाली है। 3. 2021 की चमोली आपदा उत्तराखंड में नंदा देवी ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटने के कारण हुई थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1 और 2 (B) केवल 1 और 3 (C) केवल 2 और 3 (D) 1, 2 और 3 उत्तर: (B) केवल 1 और 3 — कथन 2 गलत है: झील का विस्तार अस्थिरता का संकेत देता है और निगरानी की आवश्यकता को इंगित करता है, लेकिन GLOF तत्काल होने की पुष्टि नहीं करता; यह मोरेन की मजबूती, भूकंपीय जोखिम और भूस्खलन की संभावना पर भी निर्भर करता है।
विषय 3: सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन GS पेपर 2/3 │ स्वास्थ्य नीति │ जनजातीय कल्याण │ आनुवंशिक विकार │ SDG 3
चर्चा में क्यों? हाल ही में मध्य प्रदेश के खंडवा जिले (ओंकारेश्वर) में आयोजित एक कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन की प्रगति की सराहना की। उन्होंने कहा कि सभी राज्यों की सामूहिक शक्ति और सक्रिय भागीदारी के माध्यम से भारत अपने निर्धारित लक्ष्य (साल 2047) से काफी पहले इस आनुवंशिक बीमारी को पूरी तरह खत्म कर देगा।
सिकल सेल एनीमिया क्या है?
आनुवंशिक विकार: यह एक जन्मजात और वंशानुगत रक्त विकार है, जो माता-पिता से बच्चों में स्थानांतरित होता है।
असामान्य हीमोग्लोबिन: इसमें शरीर में दोषपूर्ण हीमोग्लोबिन बनता है, जिससे लाल रक्त कोशिकाएं (RBCs) गोल और लचीली होने की बजाय सख्त और हँसिए के आकार की हो जाती हैं।
प्रभाव: ये विकृत कोशिकाएं समय से पहले नष्ट हो जाती हैं (जिससे गंभीर एनीमिया होता है) और रक्त वाहिकाओं में फंसकर ऑक्सीजन के प्रवाह को रोक देती हैं। इससे अंगों को नुकसान और अत्यधिक दर्द होता है।
आदिवासी समुदायों पर प्रभाव और सरकारी प्रयास
1. असमान प्रभाव
वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि सिकल सेल एनीमिया आम आबादी की तुलना में आदिवासी समुदायों में कई गुना अधिक प्रचलित है। इसका मुख्य कारण भौगोलिक अलगाव और सजातीय विवाह रहे हैं।
2. राष्ट्रीय मिशन की प्रगति
साल 2023 में राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन की शुरुआत की गई थी।
स्क्रीनिंग लक्ष्य: इस मिशन के तहत 0 से 40 वर्ष की आयु के 7 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग का लक्ष्य रखा गया था।
समय से पहले सफलता: राष्ट्रपति के अनुसार, मिशन के कई प्रमुख लक्ष्यों को निर्धारित समय-सीमा से बहुत पहले ही हासिल कर लिया गया है, जो इसकी त्वरित प्रशासनिक सफलता को दर्शाता है।
चुनौतियां
जागरूकता और सामाजिक स्वीकार्यता: आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में इस बीमारी को लेकर अभी भी जागरूकता की कमी है। इसे ‘पीढ़ी दर पीढ़ी’ बढ़ने वाले संकट के रूप में पहचानना और विवाह से पूर्व जेनेटिक काउंसलिंग को बढ़ावा देना अनिवार्य है।
प्रारंभिक जांच और स्वास्थ्य अवसंरचना: यद्यपि स्क्रीनिंग में तेजी आई है, लेकिन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) के स्तर पर त्वरित जांच और उपचार (जैसे हाइड्रोक्सीयूरिया दवा की उपलब्धता) को सुदृढ़ करना होगा।
सामूहिक और अंतर-मंत्रालयी प्रयास: जैसा कि राष्ट्रपति ने रेखांकित किया, इस बीमारी का उन्मूलन केवल स्वास्थ्य मंत्रालय का काम नहीं है। इसमें जनजातीय कार्य मंत्रालय, राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को मिलकर एक ‘सामूहिक जन-आंदोलन’ के रूप में काम करना होगा।
UPSC नोट UPSC मुख्य परीक्षा लिंकेज: यह विषय GS पेपर 2 (स्वास्थ्य नीति, जनजातीय कल्याण योजनाएं, सामाजिक न्याय) को GS पेपर 3 (आनुवंशिक विकार, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली) और SDG 3 (स्वास्थ्य और कल्याण) से जोड़ता है। ‘आदिवासी समुदायों पर असमान प्रभाव + सजातीय विवाह’ का आयाम स्वास्थ्य-समानता या जनजातीय कल्याण के किसी भी उत्तर में विशिष्ट डेटा बिंदु के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।
परीक्षोपयोगी प्रश्न (मुख्य परीक्षा)“सिकल सेल एनीमिया का समयबद्ध उन्मूलन उतना ही सामाजिक जागरूकता और अंतर-मंत्रालयी समन्वय की चुनौती है जितना चिकित्सा अवसंरचना की।” भारत के राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
परीक्षोपयोगी प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा – MCQ)सिकल सेल एनीमिया के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह एक संक्रामक रोग है जो मुख्य रूप से दूषित जल और वायु के माध्यम से फैलता है। 2. इस विकार में, लाल रक्त कोशिकाएं (RBCs) अपना सामान्य गोलाकार आकार खो देती हैं और हँसिए (Sickle) के आकार की हो जाती हैं, जिससे ऑक्सीजन का प्रवाह बाधित होता है। 3. भारत सरकार ने राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन के तहत वर्ष 2047 तक इस बीमारी को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य रखा है। उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं? (a) केवल एक (b) केवल दो (c) सभी तीन (d) कोई भी नहीं उत्तर: (b) केवल दो — कथन 1 गलत है: सिकल सेल एनीमिया कोई संक्रामक रोग नहीं है, बल्कि यह एक आनुवंशिक और वंशानुगत विकार है जो माता-पिता से बच्चों में स्थानांतरित होता है। कथन 2 और 3 सही हैं।
विषय 4: सस्ती हरित ऊर्जा उत्पादन बनाम सही समय पर सही जगह पहुँचाना GS पेपर 3 │ नवीकरणीय ऊर्जा │ पावर ग्रिड अवसंरचना │ ऊर्जा सुरक्षा │ HTLS कंडक्टर
चर्चा में क्यों? भारत की चुनौती अब सस्ती हरित ऊर्जा का उत्पादन करना नहीं, बल्कि उसे सही समय पर सही जगह पहुँचाना है। भारत दुनिया की सबसे सस्ती सौर और पवन ऊर्जा का दोहन करने के लिए तैयार है, लेकिन हमारी सबसे बड़ी बाधा ‘परियोजनाओं की कमी’ नहीं, बल्कि ‘ग्रिड का पुराना और अपर्याप्त होना’ है। हरित ऊर्जा को ग्रिड से जोड़ने में लगने वाले तीन से पांच साल के समय को उन्नत तकनीकों के जरिए महीनों में बदला जा सकता है।
वर्तमान परिदृश्य और विरोधाभास
अभूतपूर्व प्रगति: भारत में वर्तमान में लगभग 250 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता है, और 100 GW निर्माणाधीन है। बैटरी की गिरती कीमतों के कारण भारत अब लगभग ₹3.5 प्रति किलोवाट घंटे की दर से चौबीसों घंटे (24X7) स्थिर स्वच्छ ऊर्जा दे सकता है।
समय का अंतर: जहां एक सौर या पवन ऊर्जा परियोजना 12 से 18 महीनों में तैयार हो जाती है, वहीं उसके ट्रांसमिशन नेटवर्क (बिजली लाइनों) को बनाने में भूमि अधिग्रहण और स्वीकृतियों के कारण 3 से 5 साल लग जाते हैं। इस वजह से 50 GW से अधिक स्वच्छ ऊर्जा क्षमता अटकी हुई है।
भविष्य की मांग: 2050 तक उद्योग और परिवहन के विद्युतीकरण के लिए भारत को लगभग 2,000 गीगावाट क्षमता की आवश्यकता होगी, जिसके लिए दुनिया के सबसे बड़े ट्रांसमिशन नेटवर्क निर्माण की जरूरत है।
मौजूदा ग्रिड से 1,000 GW बिजली निकालने के स्तंभ
1. बैटरी स्टोरेज का एकीकरण
चुनौती: वर्तमान में सौर ऊर्जा ट्रांसमिशन लाइनों का उपयोग केवल दिन में (लगभग 25% समय) करती है। रात और शाम के समय ये लाइनें खाली रहती हैं।
समाधान: इन कनेक्शन पॉइंट्स पर बड़ी बैटरियां लगाने से दिन की अतिरिक्त बिजली को स्टोर किया जा सकता है और पीक आवर्स (शाम/रात) में सप्लाई किया जा सकता है। इससे बिना नई जमीन खरीदे ग्रिड की क्षमता 400 गीगावाट तक बढ़ सकती है।
2. कोयला गलियारों का स्मार्ट उपयोग
चुनौती: भारत के कई पुराने या महंगे कोयला आधारित बिजली संयंत्र बहुत कम क्षमता पर चल रहे हैं, लेकिन उनके पास मूल्यवान बिजली लाइनें मौजूद हैं।
समाधान: इन कोयला संयंत्रों के पास ही नए सौर और पवन पार्क स्थापित किए जाएं। जब कोयला इकाइयां पूरी तरह चालू न हों, तब इसी खाली ट्रांसमिशन क्षमता का उपयोग करके सस्ती हरित ऊर्जा को शहरों तक पहुंचाया जाए। इससे 100 गीगावाट अतिरिक्त क्षमता मिलेगी।
3. मौजूदा सबस्टेशनों को अपग्रेड करना
देश भर में फैले मौजूदा ट्रांसमिशन सबस्टेशन नोड्स पर नई नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को सीधे जोड़ा जाए और उन्हें बैटरियों से लैस किया जाए। यह रणनीति राष्ट्रीय स्तर पर 100 गीगावाट अतिरिक्त स्वच्छ ऊर्जा को ग्रिड में संभाल सकती है।
4. आधुनिक तारों का उपयोग
चुनौती: भारत का अधिकांश ग्रिड अभी भी पुराने पारंपरिक तारों का उपयोग करता है, जो गर्मी के कारण झुक जाते हैं और अधिक बिजली प्रवाहित नहीं कर पाते।
समाधान: इन्हें घरेलू स्तर पर निर्मित उच्च तापमान, कम झुकाव वाले कंडक्टरों (HTLS) से बदला जाए। यह रेलवे ट्रैक को बदले बिना ट्रेन के इंजन को अपग्रेड करने जैसा है। इससे उसी मार्ग पर बिजली वहन क्षमता दोगुनी हो जाएगी (लगभग 400 गीगावाट का अतिरिक्त लाभ)।
आगे की राह
भारत को अगले दशक में अपने ग्रिड विस्तार पर 100 अरब डॉलर से अधिक खर्च करने की योजना बनानी है। इसे सफल बनाने के लिए तीन नीतिगत बदलाव अनिवार्य हैं:
राज्य स्तर पर नियमों का क्रियान्वयन: राष्ट्रीय विद्युत नियामक के उन नियमों को राज्यों में भी सख्ती से लागू किया जाए, जो सौर संयंत्रों के साथ स्टोरेज को जोड़ना अनिवार्य बनाते हैं।
खरीद मानदंडों में बदलाव: उन पारेषण प्रौद्योगिकियों (जैसे HTLS कंडक्टर) को प्राथमिकता दी जाए जिनकी शुरुआती लागत थोड़ी अधिक हो सकती है, लेकिन वे बिना जमीन अधिग्रहण के जीवनकाल में कई गुना अधिक परिणाम देती हैं।
समन्वित गलियारा विकास: बड़े नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों का विकास और ट्रांसमिशन लाइनों की योजना एक साथ बनाई जाए, ताकि समय की बर्बादी को रोका जा सके।
UPSC नोट UPSC मुख्य परीक्षा लिंकेज: यह विषय GS पेपर 3 (अवसंरचना, ऊर्जा सुरक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा नीति) में सीधे फिट बैठता है और आत्मनिर्भर भारत व औद्योगिक विकास की कथा से जुड़ता है। चार स्तंभों का ढांचा (बैटरी स्टोरेज, कोयला गलियारे, सबस्टेशन अपग्रेड, HTLS कंडक्टर) किसी भी ग्रिड-आधुनिकीकरण उत्तर के लिए एक तैयार संरचना प्रदान करता है।
परीक्षोपयोगी प्रश्न (मुख्य परीक्षा)“भारत की नवीकरणीय ऊर्जा परिवर्तन में बाधा अब उत्पादन क्षमता की कमी नहीं, बल्कि ट्रांसमिशन अवसंरचना की सीमाएं हैं।” इस कथन की विवेचना कीजिए और भारत की स्वच्छ ऊर्जा ग्रिड एकीकरण खाई को पाटने के लिए आवश्यक नीतिगत उपायों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
परीक्षोपयोगी प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा – MCQ)भारत की नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिड एकीकरण चुनौतियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. भारत में सौर ट्रांसमिशन लाइनों का उपयोग लगभग पूरे दिन होता है, जिससे स्टोरेज एकीकरण के लिए बहुत कम गुंजाइश बचती है। 2. उच्च तापमान, कम झुकाव वाले (HTLS) कंडक्टर नई भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता के बिना मौजूदा ट्रांसमिशन मार्गों पर बिजली वहन क्षमता बढ़ा सकते हैं। 3. एक नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क बनाने में आमतौर पर उत्पादन परियोजना बनाने से अधिक समय लगता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1 और 2 (B) केवल 2 और 3 (C) केवल 1 और 3 (D) 1, 2 और 3 उत्तर: (B) केवल 2 और 3 — कथन 1 गलत है: सौर ट्रांसमिशन लाइनें वर्तमान में केवल लगभग 25% समय (दिन में) उपयोग होती हैं, यही कारण है कि बैटरी स्टोरेज एकीकरण शाम/रात के निष्क्रिय घंटों में महत्वपूर्ण अतिरिक्त क्षमता अनलॉक कर सकता है।
विषय 5: सुरक्षित सीमाएं बनाम मानवीय गरिमा — यूरोपीय संघ का ‘वापसी विनियमन’ GS पेपर 2 │ अंतर्राष्ट्रीय संबंध │ प्रवासन नीति │ मानवाधिकार │ राष्ट्रीय संप्रभुता
चर्चा में क्यों? 17 जून 2026 को यूरोपीय संसद ने एक कड़ा कानून पारित किया। इसके तहत अब यूरोपीय संघ के देश अवैध प्रवासियों को गैर-ईयू (तीसरे देशों) में बनाए गए ‘निर्वासन केंद्रों’ (Deportation Hubs) में भेज सकेंगे। इस कानून को ‘वापसी विनियमन’ कहा जा रहा है। यह कानून 2024 के ‘ईयू प्रवासन और शरण समझौते’ का हिस्सा है, जो 12 जून 2026 से प्रभावी हुआ है।
कानून के मुख्य प्रावधान
तीसरे देशों में निर्वासन: जिन प्रवासियों को यूरोप में रहने का कानूनी अधिकार नहीं है, उन्हें गैर-ईयू देशों में बने ‘रिटर्न सेंटर्स’ में रखा जाएगा।
लंबी हिरासत अवधि: अवैध प्रवासियों को वापस भेजने की प्रतीक्षा अवधि को 6 महीने से बढ़ाकर अधिकतम 2 वर्ष कर दिया गया है। सुरक्षा जोखिम वाले मामलों में यह अनिश्चितकालीन भी हो सकती है।
सख्त कानूनी कदम: प्रवासियों के घरों की तलाशी की अनुमति होगी। असहयोग करने पर जुर्माना और आपराधिक प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।
अपवाद: इस कानून से केवल बिना माता-पिता वाले नाबालिग बच्चों को छूट दी गई है। बच्चों वाले परिवारों को भी इन केंद्रों में भेजा जा सकता है।
इस कानून की आवश्यकता क्यों पड़ी?
कम वास्तविक वापसी: आंकड़ों के अनुसार, यूरोप छोड़ने का आदेश पाने वाले प्रवासियों में से केवल 28% ही वास्तव में अपने देश लौटते हैं। बाकी प्रवासियों को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।
राजनीतिक दबाव: पिछले एक दशक में पूरे यूरोप में धुर-दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ा है। आम जनता में अवैध प्रवासियों को लेकर असंतोष है।
वैश्विक मॉडल: यह पहली बार नहीं है। ब्रिटेन ने ‘रवांडा मॉडल’ और इटली ने ‘अल्बानिया मॉडल’ के जरिए प्रवासियों को बाहर भेजने की कोशिश की है। अब ईयू इसे पूरी तरह कानूनी रूप दे रहा है।
मानवाधिकार बनाम संप्रभुता: मूल बहस
मानवाधिकार संगठनों की चिंता: ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ और वामपंथी दलों का कहना है कि यह कानून मानवीय गरिमा के खिलाफ है। विकासशील देशों को पैसा देकर वहां प्रवासियों के लिए ‘जेल जैसे केंद्र’ बनाना यूरोप के नैतिक पतन को दर्शाता है। इससे प्रवासियों के शोषण का खतरा बढ़ेगा।
संप्रभुता और सुरक्षा: यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे ‘निष्पक्ष और दृढ़’ नीति कहा है। राज्यों का मानना है कि अपनी सीमाओं की रक्षा करना और अवैध प्रवासन को रोकना किसी भी संप्रभु राष्ट्र का बुनियादी अधिकार है।
UPSC नोट UPSC मुख्य परीक्षा लिंकेज: यह विषय GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध, वैश्विक प्रवासन शासन, मानवाधिकार बनाम राज्य संप्रभुता की बहस) में फिट बैठता है। भारत 1951 के शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, इसलिए यह केस स्टडी शरणार्थी एवं प्रवासन प्रबंधन पर भारत के दृष्टिकोण के लिए भी महत्वपूर्ण है।
परीक्षोपयोगी प्रश्न (मुख्य परीक्षा)यूरोपीय संघ का ‘वापसी विनियमन’ प्रवासन शासन में राज्य संप्रभुता और मानवाधिकारों के बीच व्यापक वैश्विक तनाव को उजागर करता है। इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए और शरणार्थी एवं प्रवासन प्रबंधन पर भारत के दृष्टिकोण के लिए प्रासंगिक सबक निकालिए। (250 शब्द, 15 अंक)
परीक्षोपयोगी प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा – MCQ)यूरोपीय संघ के ‘वापसी विनियमन’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. यह ईयू सदस्य देशों को अवैध प्रवासियों को गैर-ईयू देशों में स्थापित निर्वासन केंद्रों में भेजने की अनुमति देता है। 2. बिना माता-पिता वाले नाबालिग बच्चों के साथ-साथ सभी बच्चों वाले परिवारों को भी इस कानून से पूरी तरह छूट दी गई है। 3. यह विनियमन 2024 के ईयू प्रवासन और शरण समझौते का हिस्सा है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1 और 2 (B) केवल 1 और 3 (C) केवल 2 और 3 (D) 1, 2 और 3 उत्तर: (B) केवल 1 और 3 — कथन 2 गलत है: केवल बिना माता-पिता वाले नाबालिग बच्चों को छूट दी गई है; बच्चों वाले परिवारों को भी इन वापसी केंद्रों में भेजा जा सकता है।
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