UPSC Prelims Current Affairs

UPSC Current Affairs 19 June 2026 in Hindi

Riyasat IAS Mentorship Team Updated 19 Jul 2026 23 min read

आज के विषय (Topics Covered Today) — 2

  • NFHS-6 और भारत में पोषण की स्थिति — GS पेपर 2 (स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय, सरकारी नीतियां)
  • गैर-टैरिफ बाधाएं (Non-Tariff Barriers – NTBs) और वैश्विक व्यापार — GS पेपर 3 (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, भारतीय अर्थव्यवस्था)
विषय 1: NFHS-6 और भारत में पोषण की स्थिति GS पेपर 2 │ राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण │ पोषण (POSHAN) अभियान │ सामाजिक-स्वास्थ्य संकेतक
⚡ चर्चा में क्यों? हाल ही में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) की रिपोर्ट भारत में सामाजिक-स्वास्थ्य संकेतकों की एक मिश्रित तस्वीर पेश करती है। जहाँ एक तरफ स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच (टीकाकरण और अस्पताल में प्रसव) में अभूतपूर्व सुधार हुआ है, वहीं दूसरी तरफ बच्चों को मिलने वाले आहार की गुणवत्ता और खान-पान की आदतें आज भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। भारत ने स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में तो लंबी छलांग लगाई है, लेकिन बच्चों की थाली और माताओं के समय पर अभी भी संकट बरकरार है।

मुख्य आंकड़े: एक नज़र में

संकेतकआंकड़ा / प्रगति
बौनापन (Stunting) — 5 वर्ष से कम उम्र35.5% से घटकर 29.3% — दीर्घकालिक स्वच्छता व पेयजल सुधार का संकेत
संस्थागत प्रसव90% प्रसव अस्पतालों/स्वास्थ्य केंद्रों में हो रहे हैं (58% सरकारी सुविधाओं में); 91% प्रसव कुशल चिकित्सा कर्मियों की देखरेख में
पूर्ण टीकाकरण (12–23 महीने)87% बच्चे पूरी तरह प्रतिरक्षित; निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी सिर्फ 3% — सफलता मुख्यतः सरकारी तंत्र व फ्रंटलाइन वर्कर्स के कारण
जन्म के पहले घंटे में स्तनपानकेवल 50% नवजात शिशुओं को जन्म के पहले घंटे के भीतर मां का दूध मिल पाता है
6–23 महीने के बच्चों में पर्याप्त आहारकेवल 15% बच्चों को ही न्यूनतम पर्याप्त आहार मिल पा रहा है

क. सकारात्मक पहलू: कहाँ मिली सफलता?

  • बौनापन (Stunting) में कमी: 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से कम लंबाई) की दर 35.5% से घटकर 29.3% हो गई है। यह दर्शाता है कि स्वच्छता, स्वच्छ पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं में दीर्घकालिक सुधार हुआ है।
  • संस्थागत प्रसव: देश में अब 90% प्रसव अस्पतालों या स्वास्थ्य केंद्रों में हो रहे हैं (जिसमें से 58% सरकारी सुविधाओं में हैं)। इसके अलावा, 91% प्रसव कुशल चिकित्सा कर्मियों की देखरेख में हुए हैं।
  • सफल टीकाकरण: 12 से 23 महीने के 87% बच्चे अब पूरी तरह प्रतिरक्षित हैं। इसमें सबसे खास बात यह है कि निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी सिर्फ 3% है, यानी पूरी सफलता हमारे सरकारी तंत्र और फ्रंटलाइन वर्कर्स के कंधों पर टिकी है।

ख. मुख्य चुनौतियां

1. खराब खान-पान और पूरक आहार में देरी

  • पहले घंटे में स्तनपान: 90% प्रसव अस्पतालों में होने के बावजूद, केवल 50% नवजात शिशुओं को जन्म के पहले घंटे के भीतर मां का दूध मिल पाता है।
  • अपर्याप्त आहार: 6 से 23 महीने के केवल 15% बच्चों को ही न्यूनतम पर्याप्त आहार मिल पा रहा है। भारत में छह महीने के बाद ठोस आहार देने की शुरुआत ‘अन्नप्राशन’ जैसे सांस्कृतिक अनुष्ठानों से जुड़ी है, जिसमें देरी होने पर बच्चे के विकास में हमेशा के लिए रुकावट आ जाती है।

2. ‘मातृ समय का संकट’

यह एक बेहद महत्वपूर्ण ‘जेंडर परिप्रेक्ष्य’ है। ग्रामीण और अनौपचारिक क्षेत्रों में महिलाएं खेती, पशुपालन और घरेलू कामों में इतनी व्यस्त हैं कि उनके पास शिशु की देखभाल के लिए समय की भारी कमी है। गांवों में शिशु देखभाल केंद्रों की कमी के कारण वे बच्चों को बुजुर्गों या बड़ी बेटियों के भरोसे छोड़ देती हैं, जिससे स्तनपान और समय पर खाना खिलाना प्रभावित होता है।

3. प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का जाल

उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण दिखाता है कि लोग अब अनाज से हटकर पैकेज्ड, रेडी-टू-ईट और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर अधिक खर्च कर रहे हैं। ये भोजन सस्ते और आसानी से उपलब्ध तो हैं, लेकिन पोषण के मामले में खोखले हैं। दालें, मोटे अनाज (Millets), फल और मेवे आज भी देश की एक बड़ी आबादी की जेब से बाहर हैं।

आगे की राह: नीतिगत सुझाव

फोकस क्षेत्रआवश्यक कदम
पोषण (POSHAN) अभियान में बदलाववर्तमान ध्यान केवल ‘गंभीर रूप से कुपोषित’ बच्चों की पहचान पर है। इसे बदलकर ‘शुरुआती रुकावटों की रोकथाम’ पर केंद्रित करना होगा। जीवन के पहले 1,000 दिनों (गर्भावस्था से दूसरे जन्मदिन तक) पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।
डेटा का स्थानीयकरणब्लॉक या जिला स्तर पर एक पोषण विशेषज्ञ और एक डेटा विश्लेषक की भर्ती हो। आंगनवाड़ी द्वारा जुटाए गए डेटा का स्थानीय स्तर पर ही विश्लेषण करके तुरंत सुधारात्मक कदम उठाए जाएं।
व्यवहार परिवर्तनखान-पान की आदतों को बदलने के लिए सांस्कृतिक प्रथाओं (जैसे अन्नप्राशन) का सहारा लिया जाए। माताओं को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सस्ते और पौष्टिक खाद्यों की जानकारी देने के लिए डिजिटल उपकरणों का उपयोग हो।
पंचायती राज की भूमिकाबाल पोषण को ग्राम सभा और पंचायत की बैठकों का एक स्थायी एजेंडा बनाया जाए। पानी, स्वच्छता और आंगनवाड़ी के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना स्थानीय योजना का हिस्सा होना चाहिए।
शिशुगृह (Crèche) मॉडल का विस्तारदेश में ऐसे सामुदायिक क्रैश मॉडल विकसित किए जाएं जो पोषण और प्रारंभिक शिक्षा को जोड़ते हों। इससे न केवल बच्चे को सही पोषण मिलेगा, बल्कि महिलाओं का ‘अवैतनिक देखभाल का बोझ’ कम होगा और वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सकेंगी।
📌 UPSC नोट UPSC मुख्य परीक्षा लिंकेज: कुपोषण मुक्ति हेतु केवल चिकित्सा ढांचा अपर्याप्त है। इसके लिए SDG 2 (शून्य भूख) और SDG 5 (लैंगिक समानता) के अभिसरण के साथ ‘सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0’ जैसी नीतियों में बहु-क्षेत्रीय समन्वय, पुरुष सहभागिता तथा सामाजिक-व्यवहार परिवर्तन (BCC) को एकीकृत करना अत्यंत अनिवार्य है। यह विषय GS पेपर 2 (सरकारी योजनाएं, सामाजिक न्याय) को GS पेपर 1 (जनसंख्या एवं संबंधित मुद्दे) से जोड़ता है।
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (मुख्य परीक्षा) “राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के हालिया आंकड़े भारत में स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के सुधार और वास्तविक पोषण सुरक्षा के बीच एक गहरी खाई को दर्शाते हैं।” विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा – MCQ) NFHS-6 की रिपोर्ट के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में स्टंटिंग की दर में कमी आई है। 2. भारत में 90% प्रसव अस्पतालों या स्वास्थ्य केंद्रों में हो रहे हैं, जिनमें से अधिकांश निजी क्षेत्र की सुविधाओं में हैं। 3. 6 से 23 महीने के अधिकांश बच्चों को न्यूनतम पर्याप्त आहार मिल रहा है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1   (B) केवल 1 और 2   (C) केवल 2 और 3   (D) 1, 2 और 3 उत्तर: (A) केवल 1 — कथन 2 गलत है: 90% प्रसव में से केवल 58% ही सरकारी सुविधाओं में हुए हैं, निजी क्षेत्र में नहीं। कथन 3 गलत है: 6–23 महीने के केवल 15% बच्चों को ही न्यूनतम पर्याप्त आहार मिल पा रहा है, जो एक बड़ी चुनौती है।
विषय 2: गैर-टैरिफ बाधाएं (Non-Tariff Barriers – NTBs) और वैश्विक व्यापार GS पेपर 3 │ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार │ भारत-अमेरिका व्यापार समझौता │ मुक्त व्यापार समझौते (FTAs)
⚡ चर्चा में क्यों? हाल ही में (फरवरी 2026 में) भारत और अमेरिका के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे पर सहमति बनी, जिसमें अमेरिकी आयात शुल्क को घटाकर 18% करने और भारत द्वारा अमेरिकी वस्तुओं पर शून्य शुल्क की ओर बढ़ने जैसी टैरिफ सुर्खियां छाई रहीं। हालांकि, इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू गैर-टैरिफ बाधाओं (NTBs) को हटाने पर बातचीत है, जो आधुनिक वैश्विक व्यापार में वास्तविक अवरोधक बनकर उभरी हैं।

गैर-टैरिफ बाधाएं (NTBs) क्या हैं?

ये वे सरकारी नियम, नीतियां या प्रमाणन हैं जो किसी देश में माल के प्रवेश को नियंत्रित या प्रतिबंधित करते हैं। इन्हें दो मुख्य भागों में बांटा जाता है:

  • SPS (Sanitary and Phytosanitary Measures): मानव, पशु या पौधों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े कड़े नियम (जैसे कीटनाशकों की सीमा)।
  • TBT (Technical Barriers to Trade): तकनीकी नियम, उत्पाद की पैकेजिंग, लेबलिंग के नियम, और कठिन परीक्षण प्रक्रियाएं।

टैरिफ बनाम गैर-टैरिफ: टैरिफ पारदर्शी होते हैं और उन्हें मापना आसान होता है (जैसे 10% शुल्क)। इसके विपरीत, गैर-टैरिफ बाधाएं व्यवस्था के भीतर “खामोश हथियार” की तरह काम करती हैं, जो विशेष रूप से विकासशील देशों के छोटे निर्यातकों के लिए अनुपालन लागत को अत्यधिक बढ़ा देती हैं।

टैरिफ से विनियमों की ओर बदलाव क्यों?

  • संरक्षणवाद का नया चेहरा: 1995 में विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के बाद से वैश्विक औसत शुल्क दरें लगभग आधी हो गई हैं। लेकिन देशों ने संरक्षणवाद नहीं छोड़ा; उन्होंने शुल्कों की जगह NTBs को अपना लिया। आज ये वैश्विक व्यापार के लगभग 90% हिस्से को प्रभावित करती हैं।
  • नियमों का जटिल जाल: पिछले 70 वर्षों में लागू किए गए 20,000 वैश्विक उत्पाद नियमों में से आधे से अधिक वर्ष 2000 के बाद आए हैं। अकेले वर्ष 2025 में, सरकारों ने WTO को NTBs से जुड़ी 7,700 से अधिक नई सूचनाएं भेजीं।

प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं का रवैया

अर्थव्यवस्थारवैया और प्रमुख विशेषताएं
यूरोपीय संघसबसे व्यापक नियामक उपयोगकर्ता (94% आयात को कवर करता है)। यह पर्यावरण, रासायनिक सुरक्षा और जलवायु नीतियों (जैसे CBAM — कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म और वनों की कटाई विनियमन — EUDR) को सुरक्षा कवच बनाकर व्यापार रोकता है।
अमेरिकाइसका ध्यान रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और तकनीकी प्रभुत्व पर है (77% आयात कवर)। यह सेमीकंडक्टर, एआई चिप्स और उन्नत हार्डवेयर पर निर्यात नियंत्रण और प्रतिबंधों का उपयोग करता है।
भारतपरंपरागत रूप से टैरिफ पर निर्भर रहने वाला भारत भी अब अपनी घरेलू औद्योगिक रणनीति (जैसे ‘आत्मनिर्भर भारत’) के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और रसायनों के गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (QCOs) का विस्तार कर रहा है (45% आयात कवर)।

मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) का उपयोग: कागज़ी लाभ बनाम जमीनी हकीकत

भारत का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड दिखाता है कि कागजों पर टैरिफ कम होने के बावजूद भारतीय निर्यातक जमीनी स्तर पर लाभ नहीं उठा पाए। भारत की औसत FTA उपयोग दर मात्र 25% है, जबकि विकसित देशों के लिए यह 70-80% है।

कागज़ी समझौता: टैरिफ में कमी      जमीनी हकीकत: गैर-टैरिफ बाधाएं (NTBs)      परिणाम: कम FTA उपयोग दर (~25%)

केस स्टडी: FTAs के व्यावहारिक उदाहरण

  • आसियान (ASEAN-2010): इसके साथ समझौता होने के बावजूद भारतीय व्यवसायों द्वारा तरजीही टैरिफ का लाभ उठाने की दर 50% से कम है। कारण: इंडोनेशिया के कड़े पंजीकरण नियमों के चलते भारतीय दवा निर्यात सीमित है, और थाईलैंड की जटिल सीमा शुल्क प्रक्रियाओं के कारण आभूषण निर्यातकों को हांगकांग का रास्ता चुनना पड़ता है।
  • जापान और दक्षिण कोरिया (2011): जापान के साथ FTA होने के बाद भी भारतीय फार्मा (दवा) निर्यात नगण्य है, क्योंकि वहां बाजार मंजूरी मिलने में 5 से 7 साल लग जाते हैं और वे भारतीय परीक्षण मानकों को मान्यता नहीं देते। कोरिया के साथ द्विपक्षीय व्यापार $27 अरब तक पहुंच गया, लेकिन भारत का हिस्सा केवल $6.5 अरब (लगभग 24%) ही रहा।

भारत की व्यापार कूटनीति में रणनीतिक बदलाव

  • भारत-UAE CEPA: यह समझौता ऐतिहासिक है क्योंकि यह प्रमुख वैश्विक नियामकों (जैसे USFDA, EMA) द्वारा स्वीकृत भारतीय दवाओं को स्वतः मान्यता प्रदान करता है। साथ ही, प्रयोगशाला परीक्षणों की पारस्परिक स्वीकृति से दोहरी लागत खत्म होती है।
  • भारत-EFTA TEPA (अक्टूबर 2025 से प्रभावी): यह समझौता मानकों की पारस्परिक मान्यता पर जोर देता है और NTBs की समस्याओं को निरंतर हल करने के लिए एक समर्पित कानूनी उप-समिति का गठन करता है। पहली बार, गैर-बाधाओं को कम करना एक कानूनी रूप से बाध्यकारी दायित्व बन गया है।

आगे की राह: नीतिगत सुझाव

नीतिगत सुझावतर्क/महत्व
पारस्परिक मान्यता समझौतेभारत को अपने प्रमुख व्यापारिक साझेदारों (अमेरिका, यूरोपीय संघ, यूके) के साथ परीक्षण प्रयोगशालाओं और उत्पाद प्रमाणपत्रों की पारस्परिक मान्यता के लिए बातचीत को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि ‘एक बार परीक्षण, हर जगह स्वीकार्य’ का सिद्धांत लागू हो सके।
मानकों का उन्नयनघरेलू स्तर पर भारतीय मानकों (BIS) को अंतरराष्ट्रीय मानकों (ISO/IEC) के समरूप बनाना होगा ताकि हमारे उत्पादों को विदेशी बाजारों में तकनीकी आधार पर खारिज न किया जा सके।
संस्थागत क्षमता निर्माणएमएसएमई (MSMEs) और छोटे निर्यातकों को विदेशी बाजारों की जटिल तकनीकी और पर्यावरणीय आवश्यकताओं (जैसे EU के CBAM) के बारे में शिक्षित करने के लिए एक समर्पित ‘व्यापार खुफिया और सहायता केंद्र’ स्थापित किया जाना चाहिए।
WTO मंच का रणनीतिक उपयोगभारत को समान विचारधारा वाले विकासशील देशों के साथ मिलकर विकसित देशों द्वारा पर्यावरण और सुरक्षा के नाम पर लगाए जा रहे ‘छिपे हुए संरक्षणवाद’ के खिलाफ WTO के मंच पर आवाज उठानी चाहिए।
📌 UPSC नोट UPSC मुख्य परीक्षा लिंकेज: यह विषय GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार) को GS पेपर 2 (द्विपक्षीय/क्षेत्रीय समूह और समझौते जो भारत के हितों को प्रभावित करते हैं) से जोड़ता है। ‘टैरिफ से NTBs की ओर संरक्षणवाद का स्थानांतरण’ एक उच्च-मूल्य विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण है जो किसी भी व्यापार-नीति प्रश्न में उपयोग किया जा सकता है।
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (मुख्य परीक्षा) “समकालीन वैश्विक व्यापार कूटनीति में, संरक्षणवाद का स्वरूप पारंपरिक शुल्कों से बदलकर गैर-टैरिफ बाधाओं (Non-Tariff Barriers) के रूप में अधिक जटिल और अदृश्य हो गया है।” हालिया मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए तथा भारतीय निर्यात पर इसके प्रभावों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
📝 परीक्षोपयोगी प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा – MCQ) गैर-टैरिफ बाधाओं (Non-Tariff Barriers) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: 1. SPS उपायों का संबंध मानव, पशु या पौधों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े नियमों से है, जबकि TBT का संबंध तकनीकी नियमों और परीक्षण प्रक्रियाओं से है। 2. भारत का औसत FTA उपयोग दर विकसित देशों की तुलना में अधिक है। 3. भारत-UAE CEPA प्रमुख वैश्विक नियामकों द्वारा स्वीकृत भारतीय दवाओं को स्वतः मान्यता प्रदान करता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1 और 3   (B) केवल 2   (C) केवल 1 और 2   (D) 1, 2 और 3 उत्तर: (A) केवल 1 और 3 — कथन 2 गलत है: भारत की औसत FTA उपयोग दर मात्र 25% है, जबकि विकसित देशों के लिए यह 70-80% है, यानी भारत की दर विकसित देशों से कम है, अधिक नहीं।
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